Tuesday, March 12, 2019

First English poem :)


I want to run away
Just want to go
Into the woods where the lilies grow
Besides the mountains covered with snow
Beneath the vast limitless sky
Where the moon provides the light
And the stars are shining small and bright
Away from a world which taunts me
Where in the midst of crowds, loneliness haunts me
Far from the melancholy
To a world where exist peace and harmony
I can already hear the music in my ears
The falling of rain, the chirping of birds and the running of deers
This is the place where I want to go
This is the place of which even I do not know

बीती बुलंदियI


बीती बुलंदियों के ध्वज को बंदे,
यूँ कब तक तू लहराएगा ?
ए पीछे मुड़कए देखने वाले,
तू कभी आगे ना बढ़ पाएगा.

विश्वास रख खुद पे गर तू,
खुदी से भी लड़ जाएगा
शक नही इस बात में फिर,
कि खुद ब खुद,
खुदा भी तेरा साथ निभाएगा.

आँधियाँ बहुत आएँगी,
कश्ती तेरी डगमगाएँगी,
पर थाम अपने हॉंसले,
डरना ना तू बंदे मेरे.

बस ध्यान मंज़िल का रखे,
सब भूल तू बढ़ता रहे.
इक नया सवेरा आएगा,
तूफान भी थम सा जाएगा,

थमना ना तू बंदे मेरे,
करके बुलंद ये हॉंसले,
बढ़ता चले..
तू बढ़ता चले.

पीछे ना मुड़, ना याद कर,
वो बुलंदियाँ, वो बीते पल.

ये बात अगर तू जान पाएगा,
रोके ना रुके रुक पाएगा.
बस बढ़ता ही चला तू जाएगा.
बस बढ़ता ही चला तू जाएगा.

Tuesday, July 15, 2014

ये जहान...



A poem which I wrote sometime back .. the thought had been with me like for as long as i can remember.. Tried to get into the mind of a terrorist who does realize his mistake .. but only after everything around him is destroyed .. 



तेरा ये जहान, है मेरा भी जहान
थोड़ी तेरी ज़मीन, थोड़ा मेरा आसमा

कोई जुदा नही, सब एक है हम

क्यू समझ नही में पाया ये,
क्यू नही किसी ने बताया ये,
कि तू भी इंसान, में भी इंसान.

था जुदा में तुझसे
फिर भी तुझसा ही तो था.
चंचल और नादान,
इस जहाँ की अठखेलियों से था में बिल्कुल  अंजान

फूलो सा कोमल था वो बचपन मेरा
ना परवाह थी कोई, और ना था किसी गम ने मुझे घेरा.
वो माँ का सर सहलाना, देर हुई तो डाँट लगाना.

हँसी की वो गूँजती किल्कारियाँ,
महकती हुई वो सारी फूलवारियाँ
कोई नारंगी, कोई पीला.
कोई गुलाबी, कोई नीला.

हर रंग का फूल खिला करता था हमारे यहाँ
सीधे-साधे थे हम, छोटी-छोटी खुशियों से भरा था सारा जहाँ.

वो दिन भी क्या दिन थे..
जब खेला करते थे हम वो आँख मिचोली का खेल,
याद हे आज भी मुझको, जब,
ऐसे ही इक बार हुआ था उन सौदागरों से मेरा मेल.

खेल खेल में बात हुई
फिर एक अंधेरी रात हुई
दिया ज़मीन का वास्ता,
छीना ज़मीर, और बदला ज़िंदगी का रास्ता

हुआ करती थी चिंगारी मुझमे एक,
कुछ पाने की
ज़माने को कुछ कर दिखाने की..
पर उस चिंगारी को ऐसी हवा लगी
की सब कुछ साथ मेरे वो जला गयी


इक आग लगी तबाही की,
की बस थाम बंदूक,ज़मीन की दुहाई दी
खुदा बन गया में,अपने ही जहाँ का


जिसमे फूलवारियाँ तो थे, पर कोई फूल नही ..
किसी बचपन के खेल का कोई शोरगुल नही..
बस रंग ही रंग था चारो और..
ना नारंगी, ना पीला,
ना गुलाबी , ना नीला.

ऐसा हुआ उस गुलशन का हाल
की हर तरफ बस रंग था लाल ही लाल
बस लाल ही लाल

इक जुनून सवार था सर पे मेरे
की ना रिश्ते रहे , ना नाते रहे
छूटे वो बचपन के सारे साथी मेरे,
और ना साथ मेरे कोई दोस्त रहे

बस सन्नाटा ही सन्नाटा हे अब चारो ओर
ना कोई साथ मेरे और हे ना ज़माने का शोर

क्यू किया मेने ये सब, क्यू किए मेने वो सारे काम
जान सकता नही अब, तो कैसे दू किसी को में ये इल्ज़ाम

वो में ही तो था जिसने चुने वो रास्ते
इक ऐसे ज़मीन के वास्ते
जो हे तेरी भी और हे मेरी भी


पीछे मुड़के देखता हूँ तो
सोचता हे मॅन मेरा

क्यू में समझ ना पाया ये
क्यू नही किसी ने बताया ये
कि हे तू भी इंसान
था में भी इंसान